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स्त्री एक मां है ,बहन है, बेटी है और एक पत्नी भी है ……….

स्त्री एक मां है ,बहन है, बेटी है और एक पत्नी भी है ।अपने सभी रिश्तों के साथ स्त्री स्वयं में क्या है? । उसकी भावनाएं, उसके विचार और उसका व्यवहार स्वयं के लिए क्या है ? आज के इस आधुनिक युग में स्त्री आत्मनिर्भर हो चुकी है परन्तु फिर भी कहीं न कहीं आज भी अपनी जिम्मेदारियों के चलते वह अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही है।स्वयं के लिए न सोचकर सदैव दूसरों के लिए ही सोचना क्या यही उसका जीवन है?आइए अपनी इस रचना के माध्यम से आप सभी को यह बताने का प्रयास करती हूं की एक स्त्री से क्या आशाएं की जाती है और स्वयं के लिए उसे क्या करना चाहिए ।

“बचपन से यौवन तक
वो करे परीक्षा पार
बेटियों को ही देखो
देते सदा संस्कार

घर में भाई बहन रहे
बना सुखी परिवार
इस घर रहना या
उस घर जोड़ना घरबार

आज भी इच्छाओं पर
अपनी सहती है वो वार
त्याग दया का भाव धरे
और करती सबको प्यार

मां बापू के घर हरपल
बनके रही एक बोझ
दुनिया ने ये रीत रची
मानें किसका दोष

हरपल सबकी बातों का
करती रही सम्मान
जब मानी खुद के मन की
सदा हुआ अपमान

रिश्तों की कड़ियों से भी
जुड़ी रही ये डोर
सबकी सुनकर सबकी सहकर
पड़ी रही एक ओर

पल पल, तिल तिल वो भी जली
सपनों को रख दिया आज
मां, बहन और बेटी का
पहन लिया अब ताज

स्वयं का अस्तित्व बतलाने को
बेबस वो लाचार
रिश्तों में जीती रही
जीत करे ना हार

सब रिश्तों के बीच वो
खो बैठी पहचान
खुद में खुद को ढूंढने की
ललक हुई विरान ।

कहना चाहूंगी…

स्वयं की पहले चिंता करो
फिर उसपे अभिमान
रिश्ते बनाने से पहले
समझो स्वाभिमान

अपनों से उम्मीदें करो
बिना किए फरियाद
बोलो तुम भी खुद के लिए
बिना किए अपवाद

खुद की भी गिनती करो
शून्य हटा दो आज
कर्मठ हो तेजस्विनी
ये दिखला दो आज

जीवन का ये नन्हा सफर
होता नही आसान
स्त्री जन्म ना सबको मिले
समझो इसे वरदान।।

~ डॉ. ज्योति उपाध्याय
गाज़ियाबाद

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