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सोच की लडाई ………

बादलों का रुख और नजरिया कभी नहीं बदलता
चाहे विदेश में हो चाहे अपने देश में हो
न बदलती है कभी फितरत चाँद तारों की
चाहे मंदिर में हो चाहे मस्जिद में हो
न बदलती आदत कभी दिन और रात की
चाहे गरीब का आसियाना हो या अमीरों का महल
न बदली कभी बारिशों की बूँद की ठंड़क
चाहे मिट्टी के घरों में हो चाहे संगमरमर की हवेली में हो
न बदलता कभी हवाओं का चलन
चाहे शहर में हो चाहे गाँव में हो
न बदलती कभी भूख
चाहे अमीर की हो चाहे गरीब की हो
न बदलता कभी चलना बैठना
चाहे सवर्ण की हो चाहे दलित की
न बदलती कभी बोलने की आवाज़
चाहे बच्चे की हो चाहे बूढे़ की हो
न बदलते कभी इंसान के अंग
चाहे जवान के हो चाहे बुजुर्ग के
बदलता है तो बस आदमी
आदमी के लिये स्वार्थ के लिये

~ शिखा सिंह
फतेहगढ़ फर्रुखाबाद
उत्तर प्रदेश

 

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