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‘सेवा दान फाउंडेशन’ के द्वारा डेढ़ मीटर लंबी मॉनिटर लिजर्ड को घर से किया गया रेस्क्यू

नेहा वर्मा
कानपुर नगर। विषखापर का बड़ा रूप जिसे विषखोपड़ा, मॉनिटर लिजर्ड कहते हैं इसके बारे में बहुत से अंधविश्वास हैं जिनके कारण इनकी संख्याओं में कमी आती जा रही है जो कहीं ना कहीं खाद्य श्रंखला में बाधा पैदा करता है। लोगों का मानना है कि यह बहुत ही ज्यादा विषैली होती है।
लेकिन, असल बात तो यह है कि विषखोपड़ा जरा भी जहरीला नहीं है। विषखोपड़ा एक प्रकार की बड़ी छिपकली है। जिसे विषखोपड़ा, गोहेरा, गोयरा, घ्योरा, गोह, बिचपड़ी आदि नामों से जाना जाता है। सेवा दान फाउंडेशन के द्वारा नौबस्ता स्थित गल्ला मंडी के एक घर में लगभग डेढ़ मीटर लंबी मॉनिटर लिजर्ड निकली हुई थी संस्था के वॉलिंटियर एवं वन विभाग के द्वारा मिलकर इसे रेस्क्यू किया गया। इस प्रकार की छिपकलियों की यूं तो 70 के लगभग प्रजातियां दुनिया भर में पाई जाती है लेकिन हमारे देश में इनकी चार प्रजातियां मिलती हैं। ये हैं बंगाल मानीटर लिजर्ड, येलो मानीटर लिजर्ड, वाटर मानीटर लिजर्ड और डिजर्ट मानीटर लिजर्ड।आमतौर पर लोग विषखोपड़ा या गोह को बेहद जहरीला मानते हैं। लेकिन, इस प्राणी के पास बिलकुल भी जहर नहीं है। यह सरीसृप है। यानी ठंडे रक्त वाला। इसलिए इसे धूप सेंकने की जरूरत पड़ती है। इसके मुंह में विषदंत नहीं होते हैं और न ही विष की थैली। यह अपने शिकार को चबाकर नहीं बल्कि निगलकर खाता है।

मनुष्यों के बीच घिर जाने पर भी इसकी कोशिश किसी तरह से निकल भागने की होती है। लेकिन, कई बार बहुत ज्यादा छेड़छाड़ करने पर यह काट भी सकती है। हालांकि, उसकी यह बाइट जहरीली नहीं है। पर उससे बैक्टीरियल इंफेक्शन हो सकते हैं। ऐसे जीवों के साथ कभी भी छेड़छाड़ नहीं करें। वे कहीं दिखें तो उन्हें निकलने का सुरक्षित रास्ता दें, ताकि वे अपने पर्यावास में जा सकें। अगर कभी जरूरत पड़े भी तो विशेषज्ञों की राय लें। खुद उन्हें पकड़ने की कोशिश करना ठीक नहीं। हमारी अज्ञानता, अंधविश्वास और लालच के चलते भारत में पाई जाने वाली मानीटर लिजर्ड की चारों प्रजातियां खतरे में हैं। इनकी खाल का व्यापार किया जाता है। इनके खून और मांस का इस्तेमाल कामोत्तेजक दवाओं को बनाने में किया जाता है। नर विषखोपड़ा के जननांगों का कारोबार सबसे ज्यादा प्रमुख है।

इस प्रकार का अंधविश्वास है कि इसके जननांगों को सुखाकर चांदी के डिब्बे में रखने से घर में लक्ष्मी आती है। यह अंधविश्वास लाखों मानीटर लिजर्ड की जान हर साल लेता है। इससे जुड़ा हुआ सबसे ज्यादा खौफनाक पहलू यह है कि जननांग निकालते समय गोह को जिंदा होना चाहिए।मानीटर लिजर्ड भी अपनी जीभ को बार-बार बाहर निकालकर दुनिया का अंदाजा लेती है। इसके चलते भी लोग उसे घृणा करते हैं और जहरीला समझते हैं। कहीं वो दिखे तो उसे मार देते हैं। प्राकृतिक पारिस्थितिकीय संतुलन के लिए इन प्राणियों को बचाना बेहद जरूरी है ।
संस्था के संस्थापक आशुतोष त्रिपाठी एवं उनकी टीम हार्दिक त्रिपाठी अमन शुक्ला और वन विभाग से विजय जी और सईद जी इस रेस्क्यू में उपस्थित रहे और पुनः रेस्क्यू के बाद उसे जंगल में जाकर छोड़ दिया गया।

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