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समय चला , पर कैसे चला, पता ही नहीं चला ………

मय चला , पर कैसे चला,
पता ही नहीं चला ,
ज़िन्दगी की आपाधापी में ,
कब निकली उम्र हमारी यारो ,
पता ही नहीं चला ,

कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे ,
कब कंधे तक आ गए ,
पता ही नहीं चला ,

किराये के घर से शुरू हुआ था सफर अपना ,
कब अपने घर तक आ गए ,
पता ही नहीं चला ,

साइकिल के पैडल मारते हुए हांफते थे उस वक़्त,
कब से हम कारों में घूमने लगे हैं ,
पता ही नहीं चला ,

कभी थे जिम्मेदारी हम माँ बाप की ,
कब बच्चों के लिए हुए जिम्मेदार हम ,
पता ही नहीं चला ,

एक दौर था जब दिन में भी
बेखबर सो जाते थे ,
कब रातों की उड़ गई नींद ,
पता ही नहीं चला ,

जिन काले घने बालों पर
इतराते थे कभी हम ,
कब सफेद होना शुरू हो गए
पता ही नहीं चला ,

दर दर भटके थे नौकरी की खातिर ,
कब रिटायर हो गए समय का ,
पता ही नहीं चला ,

बच्चों के लिए कमाने बचाने में
इतने मशगूल हुए हम ,
कब बच्चे हमसे हुए दूर ,
पता ही नहीं चला ,

भरे पूरे परिवार से सीना चौड़ा रखते थे हम ,
अपने भाई बहनों पर गुमान था ,
उन सब का साथ छूट गया ,
कब परिवार हम दो पर सिमट गया ,
पता ही नहीं चला ,

अब सोच रहे थे अपने
लिए भी कुछ करे ,
पर शरीर ने साथ देना बंद कर दिया ,
पता ही नहीं चला

~ अल्का अग्निहोत्री
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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