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ये धरा व्याकुल बहुत ………..

राधिका के कृष्ण मोहन,
प्राण प्यारे सावरे!
ये धरा व्याकुल बहुत है,
बिन तुम्हारे सावरे!

पाँव में घुघरू पहन कर,
रास लीला फिर करो!
नाग से नदिया विषैली,
पीर प्रभु आकर हरो!

देख लो यमुना बुलाती,
औ किनारे सावरे!
ये धरा व्याकुल बहुत है,
बिन तुम्हारे सावरे!

प्रेममय शुचि गंध से अब,
अंत हो हर व्याधि का!
छेड़ दो फिर तान मीठी,
बावरी हो राधिका!

झिलमिलायें भूमि पर फिर,
चाँद तारे सावरे!
ये धरा व्याकुल बहुत है,
बिन तुम्हारे सावरे!

धर्म से भटके मनुज को,
ज्ञान देकर तार दो!
राह दिखलाकर पथिक को,
प्रेम का उपहार दो!

पापियों का नष्ट कर दो,
पाप सारे सावरे!
ये धरा व्याकुल बहुत है,
बिन तुम्हारे सावरे!


आधार छंद: गीतिका(मापनी युक्त मात्रिक) 26 मात्रा, मापनी-2122,2122,2122,212,

~ रेनू द्विवेदी
गोमती नगर, लखनऊ

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