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यह ग़रीबी भी नहीं तो क्या है ………

हचान होते हैं ए ग़ालिब ग़रीबी के ,
दृष्टि की इन तख्तों पर —
हो झांकती चमड़ी के चादर से हड्डियां जिनकी ,
नंगे पांव क्रीड़ा करती हो धड़ा पर उनकी ,
एक दो रोटी चार हिस में हो बटती ,
यही सब तो है दृष्टि चित्र ग़रीबी के ….!!!
मगर सुन है ग़ालिब …! आंकड़ों के ग़रीबी और भी है ….

लाडली तो होती है बेटियां..
ज़ूल्मों का कहर तो बहू है ढाहती ,
हो जाते हैं फंदे गले के, बुढ़ापे में जीवन सृजक ;
मगर कब्र की पगडंडी हो रक्तसृजक मेरा ,
यह उम्मीद पारिवारिक ग़रीबी नहीं तो क्या है !!!

चोरी, लूटपाट , अहिंसा यह सब तो कुछ भी नहीं …
उखाड़ ली जाती है जड़े बेतुक बातों की भी यहां ;
उंघती दिखती है मंद रोज़गार का जहां ;
यह भ्रमित रंगमंच सामाजिक ग़रीबी नहीं तो क्या है !!!

पगड़ी होती है हमारे इज्ज़त की शान ;
अब फटी जींस और हैट लगाना ही समझते हैं सब अपनी आन ;
तंग वस्त्रों से निहारती काया , हया पीती है ऐसे ;
लड़कियां कभी साड़ी पहनी ही नहीं हो जैसे ,
यह सभ्यता संस्कृतिक ग़रीबी नहीं तो क्या है !!!

बहक गई नज़रें , बिक गया ईमान, आ गई जोश की आंधी ;
समझ लिया लड़कियों को खर-पतवार ;
अरे ! उसने ऊंची सैंडल और छोटे ड्रेस जो है पहने ,
यह सोच प्रणाली वैचारिक ग़रीबी नहीं तो क्या है !!!

इमारतें ऊंची , सड़कें चौड़ी और हो चिकनी ;
ठंडक उपकरण- एसी , फ्रिज़ भी है चलानी ;
काट लकड़ियां उजाड़ते है हम नवचर जीवन ;
फिर क्यों है भूल जाते करना वृक्षारोपण ;
क्या नहीं हो रहे इससे भूमंडलीय ऊष्मीकरण ??
यह वैश्विक ग़रीबी नहीं तो क्या है !!!

तू डाल तथ्यों की दृष्टि इन पर भी। ………
है पहचान ग़रीबी के यह भी ए ग़ालिब ।

दिक्षा कौशिक
मुज़फ़्फ़रपुर , बिहार

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