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मैं निशा हूँ निशा मैं छलूंगी नहीं- निशा सिंह ‘नवल’

समय टुडे डेस्क। आश्विन माह (सितम्बर) हिदी प्रेमियों के उत्सव का समय है I इस माह ही देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति और शिक्षक स्व. डाॅ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन (5 सितंबर) पर हम शिक्षक दिवस मनाते हैं, निज गुरुओं का सम्मान करते हैं अथवा श्रृद्धांजलि अर्पित करते हैं I संविधान सभा ने इसी माह, 14 सितंबर 1949 को हिन्दी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया था इसलिए इस तिथि को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है I इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं के मद्देनजर इस माह को हिंदी माह भी कहा जाने लगा है | इन्हीं कारणों से इस माह पूरे देश में काव्य गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों और साहित्यिक कार्यक्रमों की भरमार रहती है I इस उत्सवी माहौल में साहित्यिक संगठन ‘साखी मानस’ की मासिक गोष्ठी 12 सितम्बर को संपन्न हुयी | कार्यक्रम का आग़ाज़ नियमित सदस्यों के साथ अतिथि कवयित्री सुश्री निशा सिंह ‘नवल’ और मुख्य अतिथि के रूप में पधारे प्रसिद्ध उपन्यासकार एवं साहित्यकार श्री कौस्तुभ चंदोला की गौरवमय उपस्थिति में हुआ |

कार्यक्रम के पहले चरण में हिन्दी के प्रेमाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी के जीवनवृत्त पर आधारित डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव के ऐतिहासिक उपन्यास ‘पंडितन केर पछलगा’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘चेजिंग दि लाईट’ (Chasing The Light) पर स्वयं अनुवादकर्ता कवयित्री एवं साहित्यकार सुश्री नमिता जी ने अपनी रचना-यात्रा का वर्णन करते हए कहा – “अनुवादक का दायित्व बहुत बड़ा एवं गंभीर होता है और डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव के उपन्यास, ‘पंडितन केर पछलगा’ के अनुवाद का कार्य प्रारम्भ करते समय मुझे इस दायित्व का बोध तो था किंतु मैं इसके निर्वहन में पूर्णतया सक्षम हूँ, यह मुझे न तब लगता था और न अब लगता है । मैंने ‘चेजिंग दि लाईट’ में ‘अनुवादक की बात’ (Translator’s note ) में यह बात कही भी है । किंतु जब यह कार्यभार मेरे कंधे पर आया तो मैंने इसे ईश्वर का इंगित समझकर सहर्ष इसे स्वीकारा और पूरी निष्ठा, ईमानदारी एवं परिश्रम से अपनी क्षमतानुसार इसे निभाया ।

‘पंडितन केर पछिलगा’ के बारे में दिलचस्प बात यह है कि यह जायसी पर हिन्दी का पहला और एकमात्र उपन्यास है I साथ ही यह डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव का भी पहला उपन्यास है I आश्चर्यजनक ढंग से इसका अनुवाद मेरा भी प्रथम प्रयास है I इतने संयोगों के कर्म में अवगत करना है कि एक ऐतिहसिक चरित्र पर आधारित होने के कारण स्वाभविक रूप से इस उपन्यास का कथानक किसी काल्पनिक ढाँचे पर तैयार नही किया गया है I यह वस्तुतः अपने समय के महान रचनाकार एवं सूफ़ी संत मलिक मोहम्मद जायसी के जीवन एवं उनकी महानतम रचना-यात्रा पर आधारित है | अतः मैंने अपने अनुवाद को मूलनिष्ठ ही रखने का प्रयास किया है । मेरा प्रयास कथ्य एवं शैली दोनों ही दृष्टि से मूल का अनुगमन करता है और मेरी कोशिश रही है कि अनुवाद स्रोत-भाषा (मूल पुस्तक की भाषा ) के विचारों और अभिव्यक्ति के समीप ही रहे । साथ ही मेरा आयास लक्ष्य-भाषा (अनूदित पुस्तक की भाषा ) के सहज प्रवाह को भरसक बनाए रखने का भी रहा है ।

‘पंडितन केर पछलगा’ में आँचलिक भाषा अवधी के शब्दों, कहावतों आदि का भी प्रचुर प्रयोग है। यह एक और बड़ी चुनौती थी हमारे लिए । किंतु चुनौतियाँ ही तो किसी भी यात्रा को अधिक लोमहर्षक, अधिक रुचिकर बनाती हैं और इस उपन्यास के अनुवादक के रूप में हमारे साथ ऐसा ही हुआ । जहाँ तक बन पड़ा है हमने अवधी के शब्दों, लोकोक्तियों आदि को अंग्रेजी के पाठक के लिए सहज, बोधगम्य एवं स्वीकार्य बनाने का प्रयास किया है।

इस कृति में जायसी की रचना यात्रा, सांसारिक जीवन के साथ-साथ उनकी आध्यत्मिक यात्रा, विभिन्न सम्प्रदायों, धर्मों के संबंध में जानने की अदम्य इच्छा और उनके अनुभवों का लेखा-जोखा भी है। जैसा कि हम सब जानते हैं प्रत्येक सम्प्रदाय, धर्म, पद्धति की अपनी विशेष शब्दावली होती है, अभिव्यक्ति के तरीक़े होते हैं, उन्हें सही तरीक़े से अनुवाद में संप्रेषित कर पाना भी हमारे लिए एक अलग अनुभव रहा ।
मूल उपन्यास में प्रचुर मात्रा में जायसी द्वारा कृत पद्यावालियाँ भी उल्लिखित हैं I जैसे- सोरठा, मिसल, यहाँ तक कि कालाजयी रचना ‘पद्मावत’ के कतिपय उद्धरण आदि । इनका काव्यानुवाद करने का दुःसाहस तो हम सपने में भी नहीं सोच सकते थे । किंतु भावार्थ का अनुवाद यथाशक्ति करने का प्रयास मैंने अवश्य किया है। ‘पंडितन केर पछलगा’ जैसी बहुआयामी कृति का अनुवाद और वह भी पहला प्रयास, कमियाँ तो अवश्यंभावी हैं, किंतु इस अनुभव से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। बहुत कुछ नया जानने को मिला।

कार्यक्रम के दूसरे चरण में ग़ज़लकार श्री आलोक रावत ‘आहत लखनवी’ के संचालन में सभी द्वारा काव्य पाठ किया गया | संचालक के आह्वान पर सर्वप्रथम वाणी-वंदना हेतु कवि श्री मृगांक श्रीवास्तव का आह्वान हुआ । उनकी भावाभिव्यक्ति बड़ी सरल-सहज और कुछ इस प्रकार थी –
“जग की चकाचौंध में भटका, तुझको भूला रहा ।
घर-बार के चक्कर में माँ लक्ष्मी को भजता रहा।
वर दो अब हे मातु शारदे बाकी साँसों तक तेरा साथ मिले।
अब जीवन शाम ढले माँ तेरे चरणों की छाँव मिले।“

इसके पश्चात् उदीयमान कवयित्री निशा सिंह ‘नवल’ ने अपने सुमधुर स्वर में गीत और ग़ज़ल पढ़कर वातावरण को रससिक्त कर दिया –
“ मैं निशा हूँ निशा मैं छलूँगी नहीं,I
भोर को बिन दिए मैं ढलूँगी नहीं II
तुम न सोचो कि मैं हूँ अँधेरा गहन
सुरमई साँझ मैं सबके हित में बनी I
शीत करती धरा पर युगों से हूँ मैं
रागिनी, प्रेम सलिला मैं संजीवनी II “
गीत की तरह ही उनकी ग़ज़ल भी पुरकशिश रही –
“क़सम खाई यहाँ मैंने सभी को है जगाने की
सुनहरे ख़्वाब आँखों में पिरोने की सजाने की II
यहाँ हर शख्स अपने आप में खोया हुआ सा है
नहीं फ़ुर्सत ज़रा भी है उसे रिश्ते निभाने की II “

हास्य-व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर श्री मृगांक श्रीवास्तव ने समसामयिक सन्दर्भों पर विस्फोटक फुलझड़ियाँ छोड़कर सबको तरंगित कर दिया –
“एक सत्संग में पति-पत्नी के, रिश्तों को बहुत अहम बताया,
दोनों को एक सायकिल के, दो पहिए बताया,
एक पति सत्संग में ही बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ,
जब उसने पड़ोसन को मिलाकर रिक्शे का आइडिया सुझाया ।“
उनकी दूसरी कविता में व्यंग की धार बड़ी ही पैनी थी I यथा-
“एक कांग्रेसी मंच से पप्पू बोला- ‘ मोदी से देश को बचाओ।
देश को जल्द वापस, पटरी पर फिर लाओ।‘
“बड़ी मुश्किल से जनता ने, शौचालयों में जाना शुरू किया है।
पप्पू प्लीज़ देश को वापस, पटरी पर फिर मत लाओ।“

इसके बाद बारी थी अपनी लेखनी द्वारा आंचलिकता और जीवन को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करने वाली कवयित्री सुश्री नमिता सुंदर की | इस बार वे बचपन की झांकी सजाते हुए कहती हैं –
“खनकते सिक्कों सी / बचपन की यादें / जिन्हें हम खरचते नहीं कभी / भर कर गुल्लक में / खिसका देते हैं / अलमारी के / सबसे पीछे वाले कोने में….. / यह गुल्लक / मेरा आश्वस्ति द्वीप / मेरे सबसे ज़िन्दा दिनों का / अखंडित प्रतीक ।
नमिता जी की दूसरी कविता में अद्भुत जीवनाभिव्यक्ति हुयी है I ऐसे –
“हाँ / छानी है रेत मैंने / जीवन भर / सहेजे हैं / सीप शंख / तराशे हैं / अनगढ़ पाथर / उकेरी हैं / अनगिन पगडंडियां / खोज थमी नहीं / अब भी चलती हूँ मैं / पर / अब / अपने साथ / अपने भीतर ।

डॉ. अशोक शर्मा ने मानस, महाभारत और गीतादिक प्रसंगों के प्रचलित अर्थों का परिमार्जन कर उन्हें ग्राह्य रूप में प्रस्तुत कर उन अँधेरों को मिटाने की कोशिश की है जिसमें भारत की आम जनता भ्रमित होकर भटकती रहती है –
मैंने कहा पढ़ा नहीं ? / “ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी / सकल ताड़ना के अधिकारी” / ये विचार व्यक्त करते हुए / उन्होंने तुम्हारा भी ज़िक्र किया है / पत्नी बोली तो इसमें तुम क्यूँ खुश हो रहे हो / इसमें मेरा एक बार किन्तु तुम्हारा चार बार ज़िक्र हुआ है / वह भी नहीं समझ रहे हो / अरे तुम तो इतना भी नहीं समझते / ये विचार तो श्रीराम के बाण से / अपने प्राणों के लिए भयभीत /समुद्र के हैं / जो इस कथा का एक जड़ पात्र है / मैं समझ गई / तुमने रामचरित बाँची तो है / पढ़ी नहीं.

संचालक श्री आलोक रावत ‘आहत लखनवी’ ने अपनी ग़ज़लों में ऐसे अश’आर कहे कि उसकी मुक्त कंठ से सराहना करने हेतु श्रोता बाध्य हो गए | ग़ज़ल का मतला कुछ यूँ था –
“बन गयी बात दरमियान में क्या ?
आ गयी जान फिर से जान में क्या ?
तुम परों को समेट बैठ गए
लुत्फ़ आया नहीं उड़ान में क्या ?
एक अफ़्सुर्दगी सी छाई है
कोई रहता नहीं मकान में क्या ? “
उनकी दूसरी ग़ज़ल भी अद्भुत थी –
मुहब्बत की तरह आख़िर मुहब्बत कौन करता है
जहाँ में प्यार की यानी इबादत कौन करता है II
ज़रा सी बात पे तहरीर दे देता है थाने में
शिकायत की तरह हमसे शिकायत कौन करता है II
जहाँ देखो वहाँ उलझा है ये बचपन मोबाइल में
यहाँ बच्चों की माफ़िक अब शरारत कौन करता है II”

इसके बाद छंद, ग़ज़ल, गीत तथा साहित्य की अन्य अनेक विधाओं में महारत रखने वाले डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने अपने गीतों से ऐसा समाँ बाँधा कि पूरी महफ़िल ही अपने नाम कर ली –
“मैंने मन में सूरज बोया
छालों को छिल-छिलकर धोया ।
पीड़ाओं की फ़सल उतारी
पर्वत पर सिर रख-रख रोया ।।
नेह बावरी धूम मचाये । उपवन की कलियाँ चटकाये ।
ऐसी-ऐसी लगन बहूँ मैं ।
रे मन! कैसे धीर गहूँ मैं ||
एक अन्य कविता में वे गीत को अपने ढंग से परिभाषित करते हुए कहते हैं –
“शब्द-व्यायाम से गीत बनते नहीं
वेदना के बिना व्यर्थ अनुराग है I
गीत तो आँसुओं में ढले हैं सदा
यदि हृदय में प्रबल आग ही आग है ।“

गोष्ठी अपने शीर्ष पर पहुँच चुकी थी I आज के मुख्य अतिथि श्री कौस्तुभ चंदोला जी का आह्वान हुआ | उन्होंने सभी रचनाकारों और विशेषकर ‘साखी मानस’ को सराहा, अपने आनन्द और संतोष को स्वीकारा और अपने उपन्यास ‘सन्यासी योद्धा’ से अपनी कविता ‘एकलव्य’ इस प्रकार पढ़ी –
आपका ही आधार पाकर मैं निर्बल बना धनुर्धर वीर।
लें कृपा कर परीक्षा मैं होऊंगा उत्तीर्ण।
तब गुरु द्रोणाचार्य ने कैसा अपनाया धर्म ।
सब मर्यादा भूल गए छोड़ा गुरु का कर्म।“
अपनी दूसरी रचना उन्होंने गोष्ठी में उपस्थित मातृ-शक्ति को समर्पित की –
“मानवी-देह में बेहद खूबसूरत हूँ मैं,
रस-भाव से गढ़ी एक अनुपम मूरत हूँ मैं।
घूँघट में चाँद नहीं अब मैं,
बादलों के ऊपर चमकता सूरज हूँ मैं।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव ने ‘साखी मानस’ की ओर से मुख्य अतिथि के प्रति आभार प्रकट करते हुए उनसे यह आश्वासन प्राप्त किया कि संस्था के हर अनुरोध पर वे सदैव आने को प्राथमिकता प्रदान करेंगे I इसी के साथ डॉ. श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए आगामी कार्यकम की प्रत्याशा में इस सभा के स्थगन की घोषणा की |

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