NEWS

बाल मजदूरी उन्मूलन में जन सहभागिता : सोच फाउंडेशन के साथ फेसबुक लाइव पर “वर्ल्ड अगेंस्ट चाइल्ड लेबर डे” के उपलक्ष्य में विषय “बाल मजदूरी उन्मूलन में जन सहभागिता” पर लाइव वार्ता की

समय टुडे डेस्क। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत वर्ष में बाल मजदूरी करने वाले बच्चों की कुल संख्या १.० करोड़ से ऊपर है, जो कुल बच्चों की जनसंख्या का लगभग ४ % है। जनसंख्या वृद्धि के साथ बाल श्रमिको की संख्या भी निरंतर बढ़ती जा रही है। भारतीय संविधान के अनुसार किसी उद्योग, कल-कारखाने या किसी कंपनी में मानसिक या शारीरिक श्रम करने वाले 5 – 14 वर्ष उम्र के बच्चों को बाल श्रमिक कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार – 18 वर्ष से कम उम्र के श्रम करने वाले बच्चे, बाल श्रमिक हैं। अगस्त 1987 में बाल श्रम पर राष्ट्रीय नीति घोषित हुई थी।

अपने देश के समक्ष बालश्रम की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए अनेक कदम उठाये हैं। समस्या के विस्तार और गंभीरता को देखते हुए यह एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानी जा रही है जो चेतना की कमी, गरीबी और निरक्षरता से उत्पन्न हुई है। बालश्रम रोकना केवल श्रम विभाग या सरकार का ही कार्य नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज का दायित्व भी है। इस समस्या के समाधान हेतु समाज के सभी वर्गों द्वारा सामूहिक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। इसके लिए श्रम विभाग, समाज कल्याण विभाग सहित इस कार्य में लगे एनजीओ को proactive होकर, मजदूर वर्ग में जाकर, सभा और गोष्ठियों के जरिए जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।

बालश्रम से, न केवल बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, बल्कि समाज और राष्ट्र की भी अपूरणीय क्षति होती है। बच्चों को बालश्रम से मुक्ति दिलाकर पढ़ाई से जोड़ना, हम सब का धर्म एवं कर्तव्य है। आम जनता की बालश्रम रोकने में क्या सहभागिता हो और कैसे हो , यह सवाल बहुत बार लोगों के जहन में आता है। जनता का एक निराशावादी वाक्य “हम क्या कर सकते है” को आशावादी वाक्य में बदलना “हम कर सकते है” , सरकार, आयोग और NGOs, जो बच्चों के लिए कार्य कर रही है, का एक प्रमुख कार्य होना चाहिए।

आम जनता क्या सहभागिता कर सकती है; इस पर मै अपने कुछ विचार प्रस्तुत करता हूँ :
जनसंख्या नियंत्रण कानून जरुरी है।
सबसे पहले तो बालश्रम एक सामाजिक अपराध है, दंडनीय अपराध है , बच्चों के भविष्य एवं सेहत (मानसिक, शारीरिक, सामजिक ) के साथ अन्याय है , देशहित के खिलाफ है; यह बात जनता को अपने मन मस्तिक्श में बैठानी होगी। ज्यादा संवेदनशील और जागरूक लोग, बच्चों के लिए कार्य करे , किसी न किसी गैर सरकारी सामाजिक संगठन (NGO) से जुड़े, ताकि उनके दिशा निर्देश में सकारात्मक और अर्थपूर्ण मदद हो सके।

अगर आपको, अपने आसपास कोई बच्चा बाल मजदूरी करता या शोषित होता दिखे, उसकी व्यक्तिगत मदद करे।
जो व्यावसायिक संसथान अपने यहाँ बच्चों को कार्य पर रखते है, उन्हें पहले चेतावनी दे, अगर न मने तो उनका बहिष्कार करे। जैसे उनसे व्यापर न करे, अगर स्टोर है तो सामान न खरीदे , उनके पत्र लिखे , समूह में जकर वार्ता करे , सोशल मीडिया पर लिखे। जो बच्चे बालश्रम से मुक्त हुए है , उनके पुनर्वास ( शिक्षा , स्वास्थ ) के लिए धन व समय का दान दे।
अपने यहाँ कार्य कर रहे कर्मचारी को अपने बच्चों को शिक्षा देने के लिए प्रोत्साहित करे और बाल श्रम से रोके। अगर आप उनमे से, किसी बच्चे की, स्कूल फीस के रूप में आर्थिक मदद करे, यह भी बहुत बड़ा सहयोग होगा। अगर आपके किसी रिस्तेदार के यहाँ बाल श्रमिक है, तो उन्हें प्रेरित करे के वह इन बाल श्रमिको को न रखे और उनके पुनर्वास में मदद करे।

अगर आप बच्चों के प्रति संवेदनशील है तो, सरकार के द्वारा चल रही बच्चों के लिए विभिन्न योजना की जानकारी रखे, जैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय योगी आदित्यनाथ जी द्वारा चलायी जा रही विभिन योजनाए जैसे श्रम विभाग की योजना, उत्तर प्रदेश बाल श्रम विधा योजना, अटल आवास योजना, सन्निर्माण कर्मचारी बीमा योजनाए और गरीब अशिक्षित वर्ग को जानकारी प्रदान कर मदद करे। बाल श्रमिको के लिए योजनाओं का मजदूर बस्तियों में जाकर नुक्क्ड़ नाटक द्वारा प्रचार करे। अगर आप खुद का व्यवसाय करते है हो बाल मजदूर न रखे , अपने साथी व्यापारी को भी ऐसा करने से हतोत्साहित करे। अगर आप नौकरी करते है तो अपनी कंपनी को बाल मजदूर रखने से रोकने के लिए दवाब डाले। याद रखे घर में भी बाल मजदूर रखना २००६ से दंडनीय अपराध है।

व्यस्क श्रमिको को श्रमिक कार्ड ( मजदूर कार्ड ) बनवाने के लिए प्रोत्साहित करे, रास्ता दिखलाये ताकि वह सम्पन्न होकर अपने बच्चों को पढ़ा सके।
“जहां चाह है वहां राह है” इस मुहावरे के साथ में यही कहना चाहुँगा कि, अगर जनता देश के भविष्य इन छोटे-छोटे बच्चों की मदद करना चाहे तो और भी अनेक रस्ते निकल सकते है। देश का वर्तमान युवा है और देश का भश्विष्य बच्चे है, इनका सम्पूर्ण विकास ही देश को हर छेत्र में महाशक्ति बना सकता है।

इस वार्ता में सोच फाउंडेशन से अनामिका सोनी, संस्थापक सोच फाउंडेशन, अनुप्रिया पांडेय, नेशनल कोऑर्डिनेटर, सोच,अधिवक्ताअरविन्द त्रिपाठी (हाई कोर्ट) लखनऊ, रविकांत मिश्रा, लक्ष्मण अवार्ड विनर ने सहभागिता दी।

Related Articles

Leave a Reply

Back to top button
error: Content is protected !!