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निःशब्द वेदना ……

ह्वील चेयर पर बैठी खामोशी चीख-ंउचयचीख कर सवाल कर रही थी कि क्यों आई
हो एक औपचारिक अपनापन जताने, जिसने भेजा है तुम्हें उसे दुनिया में लाने का
जुर्माना दे देंगें हम अकेले, जाओ तुम यहाँ से ………….. कि अचानक आँटी ने
पूछा, ’’बेटा कहाँ रहती हो ? जाॅब करती हो क्या ?’’
और ये बताते हुए कि मैं पूनम…….आलोक और मैं एक ही कक्षा में थे…….
…पर ऐसा लगा कि सवाल तो कुछ और था। कुछ हिचकिचा कर अपने शब्दों एवं अपनी
भावनाओं पर नियंत्रण पाते हुए जवाब दिया और खड़ी हो गई ।
’’कुछ खिला भी न पाई बेटा तुम्हें ’’ पर जैसे कुछ सुनाई देना बन्द हो गया
था ……..बस एक कागज पर अपना मोबाइल नम्बर और नाम लिखकर , हाथ जोड़ कर अपने
नाकाम जज्बातों का बो-हजय उठाये कदमों से नीचे उतर आयी और मोटर कार
स्टार्ट करके तथा अपने को नियंत्रित करके घर को रवाना हो गई ।
कुल तीन साल के रहें होंगें हम सब जब नन्हें कदमों ने, जिम्मेदार
हाथों को अपनी मासूम उंगलियों से थाम, स्कूल में आना शुरू किया था ।
आया ने बस्ता और पानी की बोतल थामते हुए कहा था, ’’ बस यहीं तक, आगे मैं ले
जाऊॅगी । ’’
दूर तक ताकती निगाहें…………. पथरा गईं हैं आज, वहाॅ तो चार घंटे
बाद आने की उम्मीद भी थी, पर यहाॅ उम्मीदें टूट चुकी हैं, धूल में मिल
गईं है , दम तोड़ दिया है हिम्मत ने, उस बाप की हिम्मत ने , जिसका सीना कभी तन
गया था यह जान कर कि साॅफ्टवेयर इंजीनियर बन गया है उसका आलोक ।
विडम्बना तो देखिए, वह रो भी तो नहीं सकता, क्योंकि वह एक सफल बेटे का
बाप जो है, समाज में उसका अपना नाम है , जब लोगों को यह पता चलेगा कि वर्मा जी
के बेेटे ने उनकी बीमारी में आना भी जरूरी न सम-हजया , तो लोग क्या कहेंगे ?
’’पूनम जरा चली जाओगी घर, पापा कुछ ठीक नहीं हैं ’’ लगा कि ’’हाँ क्यों ,
नहीं ’’
पर सच कहूॅ ’’बिल्कुल आसान नहीं था उस माॅ की कोमल मुस्कुराहट को
मुस्कुरा के वापस लौटाना , उस बाप की खामोश नजरों को उन सवालों का जवाब
देना जो वह बिन बोले पूछ रही थी ।
बारह बज गये थे, पहला दिन था स्कूल का इसलिये पापा खुद ही लेने गये थे
आलोक को । वे नन्हें कदम, दौड़ते हुए तेज बहुत तेज के पहुँच, जाने को आतुर
अपने पापा की बाहों में, सिसकते हुए भारी स्वर और बाॅहों में समेट लेना ……
….. । ऐसा ही कुछ महसूस करते होंगे वे आज, जब पुरानी तस्वीर देखते होंगे।
माॅ ने अपनी साड़ी के पल्लू में कई बार उन तस्वीरों को साफ किया होगा, हर
साल की क्लास फोटोग्राफ में जाने कितनी बार बड़ा होते देखा होगा अपने बेटे
को, कल की बात लगती है जब सेहरा सजाया था बेटे के सिर पर और लाखों बार नजर उतारी
थी , ’’ मेरे लाल सा है कोई लाखों मे ….. ’’
पिता ने तो आॅखों में ही भर लिये थे वे पल विना कुछ बोले, शांत हो
रहे, उल्लास के पल, शोर , रौनक, चहल पहल और फिर मीलों का सन्नाटा ……….
अलबम के पन्ने चिपक गये थे, तो रख दी और फिर ह्वील चेयर घुमाई और
बालकनी में शाम की हल्की धूप में आॅखें बन्द कर जानें कितनी दूर निकल गये
आलोक के पापा, कभी न वापस आने को ……..।
मोबाइल में रिंग और अपने को पाया वहीं, आँटी को दिलासा देते हुए,
ईश्वर की मर्जी सम-हजयााते हुए, इंसान के बस में नहीं है मरना जीना जैसे वार्तालाप
बोलते हुए ………..।
और यूॅ जीवन समाप्त …………. । एहसासों का अजीब समन्वय है जीवन । तो
क्या नव कल्पना, नवीन तकनीकों ने एहसासों को भी तकनीकी पहनावा पहना दिया है,
मात्र दिखावे के रंग से रंग गये हैं आज के युवा , क्या जरूरतों ने इतना छोटा कर दिया
है हमारा दायरा, कि हमारे घर की दीवारें समेट नहीं पातीं हमारे रिश्तों को,
माॅ-ंउचयबाप से ही घर घर होता है, क्या ये सिर्फ औपचारिक बातें ही हो गयी हैं ।
हर घर में एक सवाल है ……………..

पर कोई जवाब नहीं ।
माॅ, पापा ने सब कागजात कहाॅ रखे थे, कुछ हिसाब मिलाने थे ।’’ अलमारी की चाबी
थमा दी माॅ ने, डबडबाई आॅखों ने ये नजारा सपने में न सोचा था, पर शायद
वर्मा जी की नजरों ने एहसासों का अन्त देख लिया था, तभी तो सब माॅ के नाम कर
गये थे ।
क्या सच्चाइयों को बर्दाश्त कर पायेंगी श्रीमती वर्मा ? ये उन्हें भी न पता
था पर कड़े शब्दों में लिखे खत की अन्तिम पंक्तियों ने स्तब्ध कर दिया जज्बातों
को ।
अन्त में अकेले ही रहना है बेटा
सच्चाइयों के आगे ये संसार भी है छोटा
धरती पर ना शुकरों की नस्ल तुम न पैदा करना,
इस जहाॅ में अपने जैसा आलोक न लाना ।

~ डाॅ0 परमजीत कौर
( प्रधानाचार्या)
डाॅ0 वीरेन्द्र स्वरूप सीनियर सेकेंड्री स्कूल
मक्राबर्टगंज, कानपुर।

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