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नया प्रतीत होता है

ज़िन्दगी है ! हर दिन, हर पल , नया प्रतीत होता है
सरपट भागती ट्रेन के साथ ,
हर बदलता नज़ारा नया प्रतीत होता है

व्यथित हो उठता है मन किसी को दुख के छाया में देख ;
मगर कहीं खुशियों की दीवाली मनते देख नया प्रतीत होता है ।

कहीं इमारतों को देखते क्षितिज तक पहुंच जाती है नज़रें
तो कहीं तरस जाती है एक इट को आंखें , नया प्रतीत होता है

बंजरों सा हालत कर देती है यह पतझड़ ,
देख हरियाली बसंत की नया प्रतीत होता है ।

अंधेरा सा छा जाता है नाउम्मीदी में ,
तुम्हें एक आशा की किरण ;
नया प्रतीत होता है ।

फीका पड़ जाता है निराशा से ज़िंदगी का रंग ,
उम्मीद का एक किरण नया प्रतीत होता है ।

मसल देते हैं हम उंगलियों से फूलों को
फिर भी खुशबू की दस्तक ;
नया प्रतीत होता है ।

जब धुंध से भर जाता है रास्ता ;
पग पग बढ़ना नया प्रतीत होता है ।
समय का कुछ पल थम जाता…
सोचते हैं हम ,
फिर भी पल-पल घटता है नया प्रतीत होता है ।

ज़िन्दगी है ! हर दिन, हर पल, नया प्रतीत होता है ।।

— दिक्षा कौशिक–
मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार

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