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तुम क्या हो?

तुम क्या हो, तुम्हारी औकात क्या है? ये प्रश्न ऐसे तीर है जो कलंक बन कर युगों युगों से बैठे हुए हैं ,
नारी के व्यक्तित्व पर,और चुभते हैं शूल की तरह समस्त नारी जाति को।

पुरूष का अहं और बड़बोलेपन का तीक्ष्ण प्रहार कहां टिकने देता है अपने समक्ष कभी स्त्रित्व को।
भले ही कितना बदल गया हो वक्त , पर कहीं न कहीं आज भी आंकी जाती हैं स्त्रियां, और तोला जाता है उनका वजूद।

हां,मानती हूं संभल रहीं हैं स्त्रियां,तोड़ने लगी हैं बेड़ियां, नकार कर परिधियां बढ़ने लगी हैं आकाश की ओर, अपनी पहचान का परचम लहराने।परंतु आज भी कमी नहीं है ऐसे लोगों की जो अपनी संकीर्ण मानसिकता और विचारधारा मजबूरन थोपते हैं औरत पर।

इस तरह की सोच और विकृत मानसिकता के नमूने कभी कभार देखने को मिल ही जाते हैं।हमारे समाज के भीतर भी एक समाज है जो अब भी अपने घर की स्त्रियों को आगे बढ़ता नहीं देख सकता।ऐसे में उस स्त्री को अपने समस्त अधिकारों का उपयोग कर अवश्य नकारना चाहिए ऐसा अन्याय।खुद को बदलकर , आवाज़ उठाकर ही बन पाएगी वो एक सशक्त उदाहरण नारी जगत के लिए और अपने बच्चों को दें पाएगी सुखद शिक्षित भविष्य।

~ निधि भार्गव मानवी
गीता कालोनी, ईस्ट दिल्ली

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