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किसी के लिए आजकल अपनी जान जोखिम में कौन डालता है ……

ड़े-बडे पत्थर लिए एक जन सैलाब जब दूसरे समूह में टूट पड़ा तभी भीड़ के बीचों बीच एक गर्भवती महिला फँस गई वो हैरान परेशान कभी इस तरफ़ कभी उस तरफ़ भाग रही थी.. चंद लोग अपने घरों से उसे देखते मदद करनें की भी सोचते पर किसी के लिए आजकल अपनी जान जोखिम में कौन डालता है। अचानक एक पत्थर उस महिला के पेट से आ टकराया दर्द बर्दाश्त न करने कि स्थिति में वह सड़क के बीचों बीच लोटने लगी लोग इधर उधर भागने लगे ,उसके चोटों का सिलसिला बढ़ता चला गया,अक्सर ऐसे दंगों में हिन्दू मुस्लिम या कोई जाति धर्म विशेष नहीं इंसानियत घायल होती है, कुछ लोग उसे ऱौंदतें हुए एक तरफ़ भागे उनके पीछे कुछ लोंग भागे दर्द और चीख हवा में गूंजती गई पास के मकानों से लोंग रह रह कर उस महिला को झाँकते रहें सभी की सहानुभूति उस महिला के साथ थी पर मजाल कोई मदद करने को आता।हम इंसानों में से इंसानियत का मिटना सबसे बड़ी दुखद स्थिति है ..संध्या हो चली थी सड़क पर इंसानियत की लाश खून से सनी पड़ी थी। महिला का शरीर अब शान्त था एक जीव जीते जी और दूसरा दुनियाँ में आने से पहले कुचल दिया गया था बस्ती के एक घर में सदा के लिए तिमिर छा गया था पास के घरों से लोग अब भी झाँक रहे थे अफ़सोस का तिमिर उनके आसपास फैला था खिड़की से झाँकते हुए एक बूढ़ा आँसू पोछते हुए बोला आँखें बूढ़ी हो गई यह सब देखते देखते न जाने इस सांप्रदायिक तिमिर का अंत कब तक होगा।

~ मनीषा जोशी मनी
ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश

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