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कभी रोटी के लिए, कभी पैसों के लिए ……..

भी रोटी के लिए

कभी पैसों के लिए
बेची जा रही अस्मत रईसों के लिए
अच्छे-अच्छे शामिल हैं जिस्म-ए-बाजार में
कहते हैं ये सब है गरीबों के लिए
पैसों के बरसात में बाजार बन रहें हम
कहते हैं जी रहें इज्जत के लिए
इक-इक कर लूट रही सहेजी हुई अमानत
बिक रहा सबकुछ ना जाने किसके लिए
कहाँ रखोगे भरी पैसों की गठरी
दामन भी तो बचा नही छुपाने के लिए

~ रूपम सिंह
मुजफ्फरपुर, बिहार

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