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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

जैसी लाज़वाब शायरी करने वाले बशीर बद्र जी और ऐसे तमाम शायरों को पढ़ कर लिखना सीख रही युवा पीढ़ी की एक उदाहरण बनी गाहिलो, मुजफ्फरपुर बिहार से तालुख़ रखने वाली पच्चीस वर्षीय रूपम कुमारी, पिताजी किसान और मध्यम वर्ग से आने वाली रूपम जी ने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार से राजनीति विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई करने के साथ साथ ही उर्दू जगत के नामचीन हस्तियों और शायरों को पढ़ने का शौक था। उनसे ही प्रेरणा पाकर लिखना का हुनर सीखा और रूपम जी की एक रचना आज हमारे पास है:
ना शिकायत करो हमसे ,
ना आज कोई सवाल करो सालों बाद मिले हैं
बस हाल-ए-दिल बयाँ करो
कैसे गुजरी रातें तेरी कैसे गुजरे दिन
उल्फत में कई शोहबत में कट गए मेरे बिन
कि शाम रंगीन थी की रातें गमगीन थी
मेरे बिना चांदनी कितनी हसीन थी
तुम रोये कि मुस्कुराए कि सबकुछ भूलाए
या फिर याद में मेरी कोई गीत गजल गाए
हिसाब किताब छोड़ आज बातें कुछ खास करो
शिकवें गिले भूलकर इस पल का अहसास करो
शिकवें गिले भूलकर इस पल का अहसास करो

रूपम सिंह
मुज्जफरपुर, बिहार

आपको ये रचना कैसी लगी ये रूपम कुमारी को बता कर उनको स्वयं में सुधार करने का मौका अवश्य दे, अपना फीडबैक srupam955@gmail.com मेल आईडी पर देकर।

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