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ईश्वर और इंसान ………… ईश्वर हर रोज तो मरता है लोग कहते हैं मैं ईश्वर को पूजता हूँ मैं ईश्वर पर भरोसा करता हूँ …..

श्वर हर रोज तो मरता है लोग कहते हैं मैं ईश्वर को पूजता हूँ मैं ईश्वर पर भरोसा करता हूँ ईश्वर है तो सब कुछ है सब कुछ सफल होगा मगर ईश्वर को रोज मारता है इंसान हर रोज झूठी कसमे खाकर हर रोज ईश्वर का अपमान करता है आदमी नहीं मरता ईश्वर मरता है कसमों में झूठ बोल कर !
ईश्वर की मूर्ति तो हम इस लिये लगाते हैं कि एक स्थान दे सके और उनके सामने दुखडा रो सकें ,लेकिन सच तो यह है कि हमारे विश्वास में ही तो ईश्वर है हमारी सोच में ईश्वर है हमारे व्यवहार में ईश्वर है हमारी सच्चाई और इंसानियत में ईश्वर है फिर हम ईश्वर को रोज क्यों मारते है
क्यों मंदिर और पूजा घर बना कर कैद करते है शायद हम सब शामिल है इस पाप में जो एक सच्चाई की मूर्ति को रख कर हर रोज अपमान करते है उन्हें जिंदा मारते है।
ईश्वर चांद में है ईश्वर सूरज में है ईश्वर तारों, जमीन पानी और पेड़ पौधों में है जो हमें पहले से मिली है इन्हें किसी ने बनाया नही हम सब पहले जानवर थे हमने अपने को विकसित किया हमने संसार का निर्माण किया फिर सोच का निर्माण क्यों नहीं कर पाये ।
अदालतों में हर रोज ईश्वर की हत्या होती है घरों में रिश्तों में हर रोज ईश्वर को मारा जाता है क्यों अपने कर्मों की सजा ईश्वर को क्यों दी जाती है व्यक्ति खुद असफल ,अविश्वसनीय है जिसे खुद पर भरोसा नहीं वो दूसरों पर कैसे करेगा मगर इसकी सजा ईश्वर को ही भोगनी है भौगोलिक दृष्टिकोण से ग्रह सूर्य ,चंद्रमा ,शनि ,राहू ,केतु एक ग्रह है जो हमारे जीवन में शामिल है इन्हीं से हम अपनी सोच और व्यवहार बनाते है ये प्रकृति के बनाए हुए है जो लोग राशियों में शामिल करते है ।
इन्हीं के अनुसार कर्म और कार्य करते है
लेकिन व्यक्ति की सोच क्या करती है क्यों वह जानते हुए भी कुकर्म में शामिल क्यों होता है
व्यक्ति का विकास तब होगा जब वो खुद करेगा
ईश्वर को मारने से हमारे रास्ते नहीं बदलगे हम हर रोज बुरा सोच रहे होते है सजा भी देते है मगर संतुष्ट नहीं होते
स्त्रियों ,बच्चियों के साथ रोज अपमान ,हवस ,दरिंदगी ,कुकर्म करते है छोटे बड़े का अपमान करते है और कहते है हम अच्छे इंसान है

आदमी खुद को नहीं बदल सकता तो ईश्वर को बदल दो
ईश्वर खुद में पैदा करो मंदिर में नहीं।

~ शिखा सिंह
फतेहगढ़- फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश

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